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हम भी हैं…!!!

है खामोशियों का दौर
अपना कोई नहीं है
जागता मैं तन्हा यहां
संग मेरे कोई नहीं है
है विरह में बहते आंसू मेरे
अपना कहने वाला कोई नहीं है
है तन्हाइयों में झुलसती मेरी बदन
दुख में संग मेरे कोई नहीं है
बीते लम्हों की यादें हैं आतीं
यादों में तेरे सिवा कोई नहीं है
उम्मीद बांध बैठा मैं हूं तेरे लिए
हर पहर है विरह में बीतता मेरा कोई नहीं है
हूं गुमनामी की समंदर में डूबा
बचा ले जो मुझे कोई नहीं है
ब़ेजान-सी है जिंदगानी मेरी
ग़मजदा अपना कोई नहीं है
है ख्वाहिशें बिखड़ी मेरी
हंसाए जो मुझे कोई नहीं है
है घर दिल का मेरा मिट्टी का
अच्छी ख़बर कोई नहीं है
जज़्बात मेरा कोई समझे ज़माने में
अपना समझने वाला कोई नहीं है
है खामोशियों का दौर
अपना बना ले जो मुझे कोई नहीं है
~हम भी हैं

PC:Kevin Farris (Flikr)




लेखक: हिमांशु मयंक

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