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मेरी मंजिल मेरा मुकाम

कभी-कभी सोचता हूँ मैं ,
कि काश तू मेरे रूबरू होती तो कैसा होता |
तुझको अपनी आगोश में लेकर ,
दुनियां से हर रिश्ता तोड़ , दिल की हर बात करता मैँ |
हर पहर , हर शूं सिर्फ तेरा ही ख्याल रहता है मुझको ,
और सोचता हूँ सिर्फ यही , काश तू मेरे रूबरू होती तो कैसा होता |
हर वक़्त ख्वाबों में तुझसे मिलता हूँ मैँ ,
दिल की हर बेबस बात करता हूँ मैँ |
मगर जब आँख खुलती है तो तुझको करीब ना देखकर ,
फिर से उदास हो जाता हूँ मैँ |
ढूंढ़ने निकल पड़ता हूँ मैँ दुनियां के इस भंवर जाल में,
मगर जब तुझे देख नहीं पाता तो बैचेनियां घेर लेती हैं मुझको ,
और बहुत उदास हो जाता हूँ मैँ , मगर फिर यही सोचता हूँ मैँ ,
काश तू मेरे रूबरू होती तो कैसा होता |
तुझको अपनी आगोश में लेकर ,
दुनियां से हर रिश्ता तोड़ , दिल की हर बात करता मैँ |

लेखक: राजेश शर्मा

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