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दर्द-ए-दवा है दिल का लगाना

1. यूं ही खामोश जब मैं बैठा हूँ अभी,
जमाना कहता है, “तुम तो ऐसे ना थे? ”
क्या कहूँ उनसे मुरझाए फूल कभी खिल नहीं सकते.

2. दोस्तों के बीच हंसी-मजाक करना,
उनका रूठना, मेरा मनाना…
काश हमेशा ऐसा ही रहता,
रूक जाता वक्त उन्हीं दोस्तों के बीच.
हालत आदमी को मजबूर कर देता है.

3. जिन्दगी में लोगों को और चाहिए क्या?
बड़े बंगले हों, पैसे हों, मंहगी गाड़ियां हो.
अबे ओ गरीबों – “कभी खुश रहना भी सीख लिया करो”

4. तुम हो, मैं रहूं और रहे खुशनुमा पल.
साथ रहे हम यूं ही…
गुजर जाये उम्र और पता भी ना चले.

5. चंद हालात कुछ ऐसे थे उनके,
वक्त भी काफ़ी था लेकिन;
हाल-ए-दिल बयां न कर सके वो मुझे.

6. चंद अल्फाज़ बयां करना चाहूँगा.
दिल, दोस्ती, प्यार!
दिल तो बहुत लगाया मैंने प्यार में,
लेकिन दोस्ती जैसी खुशी महसूस नहीं हुई कभी.

7. दिल मैंने भी लगाया प्यार में,
पर मेरा दिल ना जाने कब कटी पतंग बन गया पता ही ना चला.
अब मैं अकेला मांझा हाथ में लिए बैठा हूँ.

8. दर्द-ए-दवा है दिल का लगाना,
पर मेरा दिल उसे मुस्कुराते देख ही खुश हो जाता है.

9. मंजिल के सफर में थकानों से कैसा बैर,
जिस दिन मिल जायेगी मंजिल;
थकान खुद-ब-खुद दूर हो जायेगा.

10. पत्थर जैसे इस जमाने में,
खुदा तेरी कद्र कौन करे.

11. ना सता साकी मुझे,
गम पिये बैठा हूँ.
नशे की क्या ख्वाहिश मुझे,
मुहब्बत किए बैठा हूँ.

12. गया था मैखाने मैं भी,
एक बोतल था उठा लाया;
पीने को जैसे ही निकाला था मैंने शराब,
कमबख़्त जा़म में भी उसी का था चेहरा नजर आया.

13. ना कर फिकर बस चलता जा अपनी मंजिल पर राही,
मिले ना मंजिल लेकिन चलना तो सीख ही जाओगे.

14. मुद्दतों ठोकर खाने के बाद के बाद मिली थी मंजिल मुझे,
ना जाने फिर किसने ठोकर मार दी मिली हुई मंजिल को मेरे.

15. हर रात आँखों में मेरी दिवाली होती है खुशी की,
पर ना जाने क्यों आँख खुलते ही मातम सा छा जाता है जिन्दगी में मेरी.

16. बोहोत-सी बातें हैं जो तुम्हें सुनानी है.
आना तुम मेरे दर पर कभी.

17. इंतजार करता रहा हर उस चौराहे पर तेरा,
जहाँ से गुजरने की तेरी उम्मीद सी थी.
खड़ा रह कर बीत गईं सदियाँ…
तो पता चला तुमने तो अपना ठिकाना ही बदल दिया था.

18. कहने को तो बोहोत-सी बातें आतीं है मुझे,
पर जालिम जमाने में कोई हमदर्द नहीं रहा मेरा.

लेखक: हिमांशु मयंक

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